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शेरदिल



गीत गज़ल सुन सुन कर थक गया हूँ मैं अंहिसा के,
कभी प्रशंसा गीत गाँधी के या कलमे नाम जवाहर के|
अब बहुत हुआ पाखंड बस करो, कोई गीत नया अब गाओ सब
उस बलिदानी आज़ाद राज का वीर बखान सुनाओ अब|

बारूदों पर खेला करता था एक बांकुरा चन्द्रशेखर
लिए क्रान्ति की मशाल हाँथ में, उजियाला करता घर घर|
पंडित जी क्या खूब खेलते नगर नगर में छापामार
इंकलाब का नारा लगाता, गोरों में छाता हाहाकार|

कोई ऐसा नहीं हुआ जो कैद कर सके पंडित जी को
बहुरूपों के महारथी इस वीर भारत के सुत को|
मगर हाय, जब मृत्यु आ गयी तो भी आज़ाद था वीर खड़ा
चन्द गद्दारों के कारण, कुत्तों से घिरकर सिंह खड़ा|

परम वीर आज़ाद के आगे मौत भी घबराकर खड़ी रही
देख त्याग फिर आज़ाद राज का, काल की आँखें भी रो पड़ी|
लिए जो था संकल्प पंडित ने, अंतिम क्षण तक उसे निभाया था
एक गोली मार स्वयं को आज़ाद कराया था|

हाँथ न आया कभी सिंह वो गीदड़ गोरों से घिरकर
जन्मा था जो आज़ाद रहा जो, आज़ाद ही वो हुआ अमर|
उस बलिदानी की कथा क्यों आज सब भूले जाते हैं?
जिसने ही आघात किया उससे क्यों वो नेता कहलाते हैं?

एक बार अब अंत में मैं नमन इस वीर को करता हूँ
तेरे चरणों में नतमस्तक हो, मैं खुद को बडभागी करता हूँ|
अमर पताका गूँजे तेरी, तेरा था बलिदान अभय
देख तेरा बलिदान समय की छाती फट गयी
हो गई तेरी कीर्ति अमर अजय|

-रजत द्विवेदी 

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