Skip to main content

जीवन संवाद

कोई लहर उठी हो सागर में भरकर जैसे कोई उमंग नयी 
या खिलें कुसुम हों वृंद भूमि या दुर्गम घने कानन में|
या कि सूरज फिर जाग उठा यूँ चीर तिमिर की छाती को 
रे जीवन तेरी परिभाषा भी अलग अलग है सबके लिए|

तू जैसे अमृत कलश कोई निकली हो सागर मंथन से 
जिसको पिला कर सुर श्रेणी को जैसे दिया कोई दान अभय|
या कि कोई बीज है तू इस जगति के नये सृजन का 
और उस नये जगत में जैसे एक पूर्ण नयी संस्कृति के आगमन का|

पर हे जीवन बता आज मुझको तेरी कोई अनुपम सीख 
किस प्रकार मैं पहचानूँ तुझको, क्या है तुझे चाहने की रीत|
बता आज कैसे मैं हो जाऊँ तेरा प्रेमी?
किस प्रकार से सीखों मैं तेरे मधुर मधुर संगीत? 

सुन पथिक एक बात राज़ की, मैं तुझसे कहती हूँ आज 
जान ज़रा की क्या है मुझको प्रसन्न रखने का राज़|
नहीं मुझे कोई लोभ संपदा,राजकाज या ख्याति का 
मुझ को तो बस चाह प्रेम की, एक मनोहर साथी का|

मुझे लालसा नहीं स्वर्ण की, ना रईस किसी थाती की 
चाह मुझे बस उन्नत मस्तक, गर्व से फूली छाती की|
सम्मानित जीवन हो जिसका, मौत भी उससे भय खाती है 
नियति भी स्वयं दीर्घकाल तक उसकी कीर्ति गाथा गाती है|

-रजत द्विवेदी 

Comments

Popular posts from this blog

वीर सुभाष तेरी जय हो ।

वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो। वीर  सुभाष  तेरी जय हो । उपकारी तेरी करनी  की कीरत यहाँ अजय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  फूँक दिया था जो  तूने  वह बिगुल क्रांति का जग में।   बसा लिया जो तूने  रंग तिरंगा रग  रग में।  निकल पड़ा  था तू जग में  करने भारत का  उद्धार आज़ाद  कराने  भारत को  करने मातृभूमि पर उपकार  तेरी उस कोशिश की जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।    अपनी  पहचान छुपाकर के  तूने भारत का नाम  किया ।  अपना जीवन त्याग कर  तूने भारत भविष्य रचा ।  अधीर हो उठी जनता आज़ादी का यह रस्ता जचा । कर डाला तूने वो कमाल जिसपर जग को विस्मय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो । -रजत द्विवेदी 

आल्हा वीर रस

आवा बन्धु,आवा भाई सुना जो अब हम कहने जाए। सुना ज़रा हमरी ये बतिया, दै पूरा अब ध्यान लगाय। कहत हु मैं इतिहास हमारा जान लै हो जो जान न पाए।   जाना का था सच वह आपन जो अब तक सब रहे छुपाय। जाना का था बोस के सपना,जो अब सच न है हो पाए। जान लो का था भगत के अपना, जो कीमत मा दिए चुकाय। जाना काहे आज़ाद हैं  पाये वीर गति अरु बीर कहाय। जान लो काहे शेर मर गए ,हो गए गीदड़ सिंह कहाय ।।१॥ ये आल्हा बरनन है उनखर,जो भारत के लाल कहाय। बड़ी अनोखी उनखर गाथा,हमके उनखर याद दिलाय। उन जोधन के राष्ट्रप्रेम के कोउ प्रेमी पार न पाए। ऊ मतवाले अलबेले थे,अपना ऋण जे दिए  चुकाय। पहिन लिहिन सब कफ़न बसंती, वीरगति को पाना चाय। एक से एक भयंकर जोधा,बरछी तीर कटार के नाइ। एक से एक विद्वान पुरोधा जो भक्ति का गीत सुनाय ।।२॥ बाजत रहे संख समर के,देत सुनाई वीर पुकार। रणभेरी गूँजी थी अइसन,उत्तेजित होते नर नार। करमभूमि फिर धरती बन गई ,होवत रहे वार पे वार। ...

कातिब..

कातिब ये लिखे अब कहानी कौन सी? अब बची है भला इश्क़ की निशानी कौन सी? अब बची है चिंगारी कौन सी इंकलाब की? सूरत बदलती दिख रही है चिराग़ की। उठी नहीं अब तक एक भी आग जिस्म में, ना इश्क़ गहरा हुआ, ना हम ही डूबे उसमें। ना वजूद को ठेस लगी, ना दिल पर बात आई, जाने बगावत की हारी हुई कौन सी बिसात आई? कातिब किसकी लिखे जिंदगानी कौन सी? फ़ैज़ की या लिखे भगत की कहानी कौन सी? ना कलम को पता, ना कातिब को इल्म है, स्याह उड़ेल कर छोड़नी है काग़ज़ पर निशानी कौन सी? - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/kaatib-ye-likhe-ab-khaanii-kaun-sii-ab-bcii-hai-bhlaa-ishk-pa1t4