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अधियारा.............

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रात के अधियारे में, एक भटकती राह पर
न जाने कितने भेड़िये, फिर रहे थे ताक में, 
अा फसीं जब मासूम जान इक, बीच उनके जाल में, 
लूट ली अस्मिता उसकी, मौज के फिराक़ में |

पर पूछो तो ज़रा उस बदनसीब जान से, 
क्या खोया उस रात उसने, 
रूह तो काँप गई ही थी, 
साँसे भी थम गई सी थी |
पर और क्या हुआ कभी सोचा है?? 
क्या हुआ हाल उसके माँ-बाप का? 
क्या हुआ हाल उसके भाई-बहनों का? 
क्या हुआ हाल उसके प्रेमी का? 
जो लाज गई तो क्या अब उसको निष्ठुर समाज अपनाएगा?
सीता या पाँचाली जैसे या उसे भी ठुकारएगा?

सच है शायद पुरुष हो कर मैं ये सब नहीं कह सकता हूँ |
पर बतलाओ हैवानियत को, मैं भला कैसे सह सकता हूँ |
ये कैसी मर्दाना शक्ति है, जो पल भर ही टिक सकती है? 
मौज करने को आतुर हैं, पर जिम्मेदारियाँ ना ले सकती हैं? 
कहने को यदि पुरुष हो कहते, तो भला कहो पुरूषार्थ है क्या? 
बल से अगर प्रेम हो पाते, तो ऐसे प्रेम का अर्थ है क्या? 

द्रौपदी तो बहुत यहाँ हैं, हैं बहुत दुशासन जैसे भी, 
पर मैं पूछ रहा हूँ आज बता कौन है राम यहाँ? 
करता ज्यादती मनुज पर, नारी का तुझको मान नहीं, 
क्या भूल गया तू बैठी हैं तेरी माँ बहने भी दूर कहीं?
मैं ना कहता तू मान सभी को अपनी माता और बहन, 
पर एक बात तू गाँठ बाँध ले, अपमान उनका न होगा सहन |
यदि प्यार किसी से हो तुझको तो उसका तू इज़हार कर, 
पर कभी नहीं उस पर अपने बल पौरुष का प्रचार कर |

जो अाग लगी हो छाती में, तो पौरुष को कर अभय दिखा |
सूखे में हरियाली ला, बंजर जर उपजाऊ कर दिखा |
पर खुद की करनी से तू मत मर्द जात पर कालिख़ मल, 
हमारा नाम बदनाम रहे मत ऐसा कोई काम तू कर |
यदि प्यार किसी से करता हो, तो उसकी लाज बचाना तू |
माँ बाप भी गर्व करे तुझ पर, ऐसा काम कर जाना तू |

-रजत द्विवेदी

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इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi

वीर सुभाष तेरी जय हो ।

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आसमान से ऊँचा......

आसमान से ऊँचा क्या है?कौन समुद्र से गहरा?  कौन भूमि से भारी जग में?कौन जल से पतला?  कौन सूर्य से भी ज्यादा चमक रहा इस जग में?  कौन डूब कर गिर जाता है घने काले गर्त में?  कौन यहाँ पर अमर हो जाते?कौन यहाँ नश्वर है?  कौन यहाँ पर सदा हारते?कौन यहाँ अजर है?  आसमान से ऊँचा जग में स्वाभिमान है नर का और समुद्र से गहरा जग में विशाल सागर प्रेम का| भूमि से भी भारी जग में पाप,कपट और छल है| जल से भी पतला इस जग में ज्ञान का गंगाजल है| सूर्य से भी ज्यादा चमकता मनुष्य का कर्म है| और डूबा देता जो गर्त में धर्म नहीं अधर्म है| सच्चा शूरवीर जगत में सदा सदा अमर है| मूढ़मती पथहीन मनुज तो निश्चय ही नश्वर है| यहाँ हारते सदा वही जो संबंधों से डरते हैं | जो समाज से संबंध बना सके, वो ही मनुज अजर है| -रजत द्विवेदी