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देखो हुआ सवेरा... 


देखो हुआ सेवरा, है सिमट रहा अंधेरा 
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गगन पर उड़ रहे पक्षी, हैं खोजते नया डेरा|
कहीं भवरे चहकते हैं, नयी कलियाँ खिलती हैं
कहीं पर नाचते मयूर, कहीं तितलियाँ उड़ती हैं|
नया दिन है, नये दिन में नयी उमंगों ने है घेरा
देखो हुआ सवेरा, है सिमट रहा अंधेरा|


नये प्रकाश से भरकर कि अब यह शर चमकता है 
तिमिर की कैद से छूटा कि दिनकर खूब हँसता है|
कहीं अब मौज में बहती नदी भी मुस्कुराती है 
कहीं सागर की लहरों में मछलियां गीत गाती हैं|
बडे़ अभिमान से हिमालय भी ज़रा अब इतराता है 
नया आलोक में उसका कि कद बढता जाता है|
है चहु ओर हरियाली,खुशियों ने किया बसेरा 
देखो हुआ सवेरा, है सिमट रहा अंधेरा|

-रजत द्विवेदी

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