Skip to main content

पासबाँ




वो पासबाँ वतन के, जो कट गए वतन पे
बाकी है कर्ज आज भी उनके लहू का हम पे|

कोई शहीद-ए-आज़ाम, कोई शेर-ए-हिन्द था
कोई बुहरूपी पंडित आज़ाद हो कर गुम था|

सब छोड़ घर चले थे, घर हिन्द को बचाने
माँ भारती की खातिर अपने कफन चढ़ाने|

पर हाय रे ये मुल्क अहसाँ फरामोश निकला
खादी तो याद है इसको, चरखा तो याद है इसको
लेकिन कलम बसंती, पिस्तौल,खाकी भूला|

भूला कलम वो जिससे भगत ने इंकलाब लिखा था
भूला पिस्तौल जो खुद पर आज़ाद ने धरा था
भूला वो खाकी सुभाष की जिससे ब्रिटेन तक डरा था|

बस ले रखा है सब ने चरखे का ही सहारा
जपते हैं बस अंहिसा, सब ने यही पुकारा|

हैं भूल जाते सब शाहदत की कहानी
जिसमें लहू से सीचीं आबाद हुई जवानी|

सरकार चाहे कुछ भी करले,चाहे जो भी बताए
शाहदत अमर रहेगी हमारे दिलों में यूँ ही समाए|

है जोर भी कहाँ सियासत में जो सत्य को छिपाए
हम तो क्रान्ति के यहाँ सदा गीत यूँ ही गुनगुनाएं|

-रजत द्विवेदी 

Comments

Popular posts from this blog

वीर सुभाष तेरी जय हो ।

वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो। वीर  सुभाष  तेरी जय हो । उपकारी तेरी करनी  की कीरत यहाँ अजय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  फूँक दिया था जो  तूने  वह बिगुल क्रांति का जग में।   बसा लिया जो तूने  रंग तिरंगा रग  रग में।  निकल पड़ा  था तू जग में  करने भारत का  उद्धार आज़ाद  कराने  भारत को  करने मातृभूमि पर उपकार  तेरी उस कोशिश की जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।    अपनी  पहचान छुपाकर के  तूने भारत का नाम  किया ।  अपना जीवन त्याग कर  तूने भारत भविष्य रचा ।  अधीर हो उठी जनता आज़ादी का यह रस्ता जचा । कर डाला तूने वो कमाल जिसपर जग को विस्मय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो । -रजत द्विवेदी 

आल्हा वीर रस

आवा बन्धु,आवा भाई सुना जो अब हम कहने जाए। सुना ज़रा हमरी ये बतिया, दै पूरा अब ध्यान लगाय। कहत हु मैं इतिहास हमारा जान लै हो जो जान न पाए।   जाना का था सच वह आपन जो अब तक सब रहे छुपाय। जाना का था बोस के सपना,जो अब सच न है हो पाए। जान लो का था भगत के अपना, जो कीमत मा दिए चुकाय। जाना काहे आज़ाद हैं  पाये वीर गति अरु बीर कहाय। जान लो काहे शेर मर गए ,हो गए गीदड़ सिंह कहाय ।।१॥ ये आल्हा बरनन है उनखर,जो भारत के लाल कहाय। बड़ी अनोखी उनखर गाथा,हमके उनखर याद दिलाय। उन जोधन के राष्ट्रप्रेम के कोउ प्रेमी पार न पाए। ऊ मतवाले अलबेले थे,अपना ऋण जे दिए  चुकाय। पहिन लिहिन सब कफ़न बसंती, वीरगति को पाना चाय। एक से एक भयंकर जोधा,बरछी तीर कटार के नाइ। एक से एक विद्वान पुरोधा जो भक्ति का गीत सुनाय ।।२॥ बाजत रहे संख समर के,देत सुनाई वीर पुकार। रणभेरी गूँजी थी अइसन,उत्तेजित होते नर नार। करमभूमि फिर धरती बन गई ,होवत रहे वार पे वार। ...

कातिब..

कातिब ये लिखे अब कहानी कौन सी? अब बची है भला इश्क़ की निशानी कौन सी? अब बची है चिंगारी कौन सी इंकलाब की? सूरत बदलती दिख रही है चिराग़ की। उठी नहीं अब तक एक भी आग जिस्म में, ना इश्क़ गहरा हुआ, ना हम ही डूबे उसमें। ना वजूद को ठेस लगी, ना दिल पर बात आई, जाने बगावत की हारी हुई कौन सी बिसात आई? कातिब किसकी लिखे जिंदगानी कौन सी? फ़ैज़ की या लिखे भगत की कहानी कौन सी? ना कलम को पता, ना कातिब को इल्म है, स्याह उड़ेल कर छोड़नी है काग़ज़ पर निशानी कौन सी? - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/kaatib-ye-likhe-ab-khaanii-kaun-sii-ab-bcii-hai-bhlaa-ishk-pa1t4