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मौत

मिलता ही नहीं कोई मुनासिब ठिकाना 
इस दहर में सुकून से जीने को 
हर तरफ़ बस बारूद के ढेरों पर जिंदगियाँ पड़ी हैं|

हर तरफ़ खौंफ का आलम बिखरा हुआ है
आबोहवा में हर ओर बस मौत भरी है|

कभी जो हुआ करते थे मोहब्बत की खिश़्तों से सजाये आशियाने 
इस आंतक के साये में मलबा बनकर पड़े हैं|

किसे पुकारें मदद का कोई हाँथ नहीं दिखता
नगर नगर के चौराहों पर सर कटी लाशें पड़ी हैं|

कोई अमन का चिराग जलता हुआ नहीं दिखता
हर तरफ़ आतंक का अंधेरा घना है|

इससे बेहतर तो कज़ा कूबूल करना होगा
ऐसी ज़ीस्त से तो मौत भली है|

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इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi

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