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राधेय

किसी विपिन में खिला कुसुम ज्यों घिर कर तीखे काँटों से   
जन्मी एक ज्योति पौरुष की, थी भरी हुई संतापों से।
हुआ जन्म जब वीर कर्ण का गंगा नदी किनारे
राजकुमारी पृथा चली ले शिशु को घाट संकारे।

लोक लाज में फंसी कुंवारी माता तड़पती जाती है
ममता और प्रतिष्ठा बीच पृथा सोचती जाती है।
किसे चुने वो लाज या कि पुत्र,किसका रक्खे मान यहाँ?
पुत्र चुने तो मान घटेगा,मान चुना तो पुत्र गया।

आखिर चुनकर मान प्रतिष्ठा त्याग दिया बालक को
बहा दिया पुत्र गंगा में, लौट चली फिर घर को।
बहता हुआ वो बालक नद में दिखा चमकता जल में
कवच और कुण्डल धारी वो दमक रहा अम्बरतल में।

अधिरथ घर के निकट पहुँच जब चमकी ये पुण्य ज्योति
राधा निकल घर से आई,भरली अपनी सुनी झोली।
राधा का पुत्र अब ये कर्ण  राधेय कहलाया
विस्मय है नियति का लेखा, क्षत्रिय सूत घर आया।

बीत गए कई वर्ष काल का चक्र हो रहा भारी
युवा हुआ राधेय शर में सुलगने लगी चिंगारी।
आ पहुंचा बीच रंगभूमि लगा ललकारने पार्थ को
द्वन्द युद्ध को पुकार रहा आँख दिखाता पार्थ को।




रंगभूमि में सज रही महाभारत की पृष्ठभूमि
जाति नाम पर कर्ण का खण्डन करते फिर पांडव दिखे।
एक सुयोधन बढ़ा कर्ण का साथ दिया
मित्र भाव से बढ़कर आगे अंग देश का राज दिया।

राधेय हुआ सुयोधन कृपा से कृतज्ञ कुछ यों
बन गया भागी सुयोधन के सभी कुरीति में ज्यों।
लाक्षागृह,द्युत,वस्त्रहरण,वनवास और अज्ञातवास
पांडव विरोध सब तंत्र रचे,षड़यंत्र सब में था कर्ण साथ।

ऋण चुकाने को सुयोधन कृपा का ऋणी हुआ राधेय जब
भूल गया गुरुशिक्षा भूल गया तप त्याग सब।
बस याद रहा उसे मित्र धर्म,और दान पुण्य का सत्कर्म
भोर बिहाने तीर किनारे रोज़ करे वह दान धर्म।

कर विचार समर की, कर सुमिरन अर्जुन का
चला इन्द्र कर्ण से मिलने ढ़ाल बनने अर्जुन का।
मांग लिया कवच और कुण्डल दानवीर के हाथों
दानवीर भी फूल गर्व से कहा "अपनी झोली साधो"।

लहुलुहान हो दानवीर ने दान दिया कुण्डल का
दिया कवच भी इंद्रदेव को,दिया मोल तपबल का।
कर्ण वीर को नमन, दान का वीर बड़ा अभिमानी
परहित में संलग्न कवच कुण्डल का बलिदानी।

पांडव से जो घृण की सम्पदा कर्ण था संजोय मन में
आखिर फूंट पड़ा वो घड़ा,उतरी कटारी तन में।
मधुसूदन बतलाते,"राधेय नहीं तू सुत पुत्र
ज्येष्ठ पांडव है, तू बुआ कुंती का वीर पुत्र"।

छाती जैसे फ़ट गई राधेय की सुनकर नारायण को
जैसे कोई खड्ग की धारी चीर रही हो तन को।
लिए घृणा का पात्र हाँथ में जिया जीवन मैं पूरा
कैसे अब अर्जुन पर बाण चलाऊं,प्रण रहा मेरा अधूरा।

भले सत्य कडवा हो,भले पांडव भ्राता मेरे
रहूँ मगर मैं साथ सुयोधन, है मुझे मित्रता घेरे।
हे केशव अपने अंतर्मन में राज़ छिपाये रखना
जब तक नहीं मैं प्राण त्यागता,यह भेद किसी से न कहना।

कुरु समर में महाप्रलय से टूट गए सब महार्थी
छल कपट बलशक्ति सभी से लड़ते रहे सभी।
भीष्म,द्रोण,अभिमन्यु,घटोत्कच सभी छल से हराये गए
शेष समर में कर्ण सुयोधन बचे युद्ध खेल रहे।

कर्ण पार्थ का युद्ध अनोखा हुआ देखता जग था
पार्थ खड़ा था बाण लिए जब कर्ण असहाय स्तब्ध था।
परशुराम के शाप के कारण भूल चुका सब शक्ति
कर्ण खड़ा रण में निर्बल,सूर्य से मांगे शक्ति।

केशव ने अर्जुन को कर्ण वध का संकेत दिया
धर्म अधर्म में फँसे पार्थ को कर्म शक्ति का ज्ञान दिया।
निर्बल शक्तिहीन कर्ण पर अर्जुन ने तीर चला डाला
एक सुरमा को छल से मिट्टी में मिला डाला।

रश्मिरथी दानवीर कर्ण सदा को अमर रहे
पौरुष के अभिमानी का नाम जगत को याद रहे।
उठी जो आग कर्ण के भीतर सबमें यूँ ही जलती रहे
जाति जाति कोई न बोले,केवल जग शक्ति पूजती रहे।

-रजत द्विवेदी

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