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आमर्त्य


तरल घूंट विष का पीकार आमर्त्य विभा को चूम गया,
गरल के मद में चूर पड़ा वो मद्यप जैसा झूम गया।
जीवन कुछ कठोर था होश में रहकर देखा जो,
और सरल हो गया हलाहल को छूकर जब देखा तो।

विष का पान किया जो मैंने, शंकर सम मैं अमर हुआ,
ज्वालाओं में बहु बार हूं झुलसा,फिर भी जग में अजर हुआ।
मधु का पान किया करते जो बेशक जीवन जीते होंगे,
मगर कहां बल उनमें ऐसा जो वो विष पीते होंगे।

बड़े भाग हैं उसके जो विष को मय समझ पी जाता है,
लड़ता जो जग से, परहित में आप स्वयं कट जाता है।
आलिंगन करता मृत्यु का, जीवन से प्रेम निभाता है,
औरों को देकर जीवन वो, स्वयं बली चढ़ जाता है।

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