गगन के चांद तारों सा ये जग में कौन शोभित है? कि नभ में आज फिर से ये किसका नाम गूंजित है? भला ये कौन है जिसपर स्वयं को काल मोहित है? मनुज ये कौन है जिसका समय पर नाम अंकित है? है नर या देव है या कि कोई गंधर्व किन्नर है? उजागर किस दिवाकर की प्रभा से इसका तन मन है? कि है कोई स्वयं में शक्तिपुंज जो ख़ुद उजागर है, उदित होता स्वयं जो सूर्य सा बन इस जगत में आज। विभा कोई चंद्रमा की या कि जुगनू का मेला है, प्रदीपित है जो यूं इंसा जगत में वो अकेला है। जले जो ख़ुद यहां और दूसरों को नूर देता है, वो मानव ही जगत में हर हवस से दूर होता है। हवस ना कीर्तियों की हो, न हो कुछ चाह शोहरत की। हवस ना हो विजय की, ना ही हो चिंता पराजय की। निरंतर जो करे बस कर्म, जो अपना धर्म जानता हो। स्वयं को वार देना औरों के हित कर्तव्य मानता हो। जो सम या कि विषम हर परिस्थिति में एक सा होता, जो जग की माया में पड़ कर कभी खुद को नहीं खोता। वही नर है सदा पूजित, जगत में नाम है उसका, समूचे लोक में ज्योतित, 'मनुज' ही नाम है उसका। - रजत द्विवेदी
कलम की स्याही से हर पल नया अंगार लिखता हूँ