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मेरी कलम...

तीर नहीं तलवार नहीं, कोई बरछी और कटार नहीं  कोई ज़हर नहीं, ना ख़ार कोई, कोई ज़ंगलगा हथियार नहीं  एक कलम मेरी बलशाली है, खाली जाता ना वार कभी| कलम से बढ़कर तेज़ कभी तलवारों में भी धार नहीं| जब जब काग़ज़ पर स्याह बहे,लहू से कलम इतिहास रचे  पीकर गरल का घूँट कलम, हो जाती है सदा को अमर अजय कलम अनल संचार करे,भरती शरों में शक्ति अभय  क्रान्ति की चिंगारी सुलगाती,कलम तेरी सदा को जय| मधुपान सभी करते निस दिन जब मदिरालय में उजियाली है तब विष पीकर बैठी मेरी कलम बड़ी मतवाली है  मद में होकर चूर सभी जब वक्त बिताया करते हैं  तब मेरी ये कलम क्रान्ति का दीप जलाया करती है| और कभी फिर कलम मेरी लिखती है गीत प्रेम के भी  अल्फाज़ों का लिए सहारा लिखती है जज्बातों को भी इंकलाब और इश्क दोनों ही मेरी कलम की है पहचान  नित नित लिखती बीज सृजन का,सृष्टि में डाले नई जान| -रजत द्विवेदी 

अंगारों पर चल कर देखो...

पथ पर देखो है कठिनाई नियति तुझे परखने आई दिखा बल तुझमें है कितना अब कुछ तो निश्चय करके देखो कोमल राहें छोड़ कभी तो अंगारों पर चल कर देखो| देख सहर नयी हुई आज फिर उत्तेजित है सूर्य आज फिर कुछ तो नया सृजन करने को संकल्प हृदय में करके देखो कोमल राहें छोड़ कभी तो अंगारों पर चल कर देखो| समरभूमि तुझे पुकारती तुझको ही है निहारती आज सूरमा बन रण में फिर संकल्प विजय की करके देखो कोमल राहें छोड़ कभी तो अंगारों पर चल कर देखो| बचपन का खेल अब बहुत हुआ गफ़लत का आलम बहुत हुआ अब जिम्मेदारियाँ काँधे धर कर कुछ बोझा सर पर ढ़ोकर देखो कोमल राहें छोड़ कभी तो अंगारों पर चल कर देखो| -रजत द्विवेदी 

वसुधा करे पुकार...

वसुधा करे पुकार,'कहाँ पर छिपा है मेरा लाल?' न्याय,धर्म का ज्ञानी,भुजबल शक्ति का अभिमानी  वो वीर व्रती महादानी, जिसकी शौर्य कीर्ति अपार| वसुधा करे पुकार| वसुधा करे पुकार,कहाँ है चन्द्रगुप्त बलवान?  नियति फल का दर्प नहीं, वो वीर कर्म प्रधान  झेलम में उठती लहरों सा, वीरता की पहचान| वसुधा करे पुकार| वसुधा करे पुकार कहाँ है चाणक द्विज महान?  पटना से गांधार तक जिसने किया एक सुर गान  निष्ठुर,व्रती,राष्ट्रभक्त वो,तक्क्षीला का अभिमान| वसुधा करे पुकार| वसुधा करे पुकार कहाँ है राय पिथोरा आज?  कहाँ गुम हुए वीर प्रताप और छत्रपति महाराज?  कहाँ गायब है अल्हा उदल, कहाँ छिपा छत्रसाल?  वसुधा करे पुकार| वसुधा करे पुकार कहाँ हैं भगत सिंह,आज़ाद?  कहाँ गुम हुई बिस्मिल की ग़ज़लें, कहाँ है गुम अशफ़ाक?  और कहो कि कहाँ गुम हुआ शेर-ए-हिन्द सुभाष?  वसुधा करे पुकार| वसुधा करे पुकार, 'क्या हुआ आज मेरा हाल?'  मेरे वीर पुत्र सब कट गए, करने मुझे आज़ाद| किन्तु हाय अब कोई नहीं यहाँ जिसे कहूँ मैं लाल| सब क...

क्या गीत लिखूँ, क्या राग लिखूँ...

बिखरे बिखरे अक्षर हैं, बिखरे से स्वर हैं हर स्वर में एक अलग भाव है, हर अक्षर की अलग बनावट है बोलो इन स्वरों को जोड़ कर मैं क्या गीत लिखूँ, क्या राग लिखूँ| एक भाव क्रान्ति का है हिय में एक इंकलाब की चिंगारी जो सुलग उठती रग रग में करने को सृजन की तैयारी बोलो भर कर स्याही में आग प्रखर क्या गीत लिखूँ, क्या राग लिखूँ| एक भाव प्रेम का है हिय में एक ख्वाब छिपा इन आँखों में एक अंजान को खोज रहा ये चंचल मन सारे जग में बोलो गाने को मिलन स्वर क्या गीत लिखूँ, क्या राग लिखूँ| एक भाव धर्म का है मन में सौहार्द प्रेम हो जन जन में ना कोई किसी का बैरी हो जब सकल जग में सब प्रेमी हों बोलो गीता रामायण का ज्ञान लिखूँ क्या गीत लिखूँ, क्या राग लिखूँ| एक भाव है मन में बैरागी का जग मोह सभी के त्यागी का फिरते रहने को वन वन में प्रकृति के परम अनुरागी का बोलो जग की मोह माया छोड़ नया क्या गीत लिखूँ, क्या राग लिखूँ| -रजत द्विवेदी 

काल अभी तुम ठहरो ज़रा....

काल अभी तुम ठहरो ज़रा  कुछ काम अभी तक बाकी हैं| कुछ कर्ज़ चुकाने बाकी हैं कुछ फ़र्ज़ निभाने बाकी हैं| काल अभी तुम ठहरो ज़रा कुछ दान धरम अभी बाकी है| कुछ परहित कर्म अभी बाकी है  कुछ मुनज धर्म अभी बाकी है| काल अभी तुम ठहरो ज़रा कुछ सजदे करना बाकी है  माँ-बाप और ईश्वर के आगे  नतमस्तक होना बाकी है| काल अभी तुम ठहरो ज़रा कुछ दिल्लगी करनी बाकी है  एक इश्क में डूबना बाकी है  फिर ख़ुद ही उभरना बाकी है| काल अभी तुम ठहरो ज़रा कुछ याद भुलानी बाकी हैं| कुछ ख्बाव देखने बाकी हैं  फिर दिल तुड़वाना बाकी है| काल अभी तुम ठहरो ज़रा अभी कुछ कहानियाँ बाकी हैं| कुछ किस्से सुनने बाकी हैं  कुछ गीत सुनाने बाकी हैं| काल अभी तुम ठहरो ज़रा एक जंग अभी तक बाकी है| ख़ुद से ही हारना बाकी है  ख़ुद से ही जीतना बाकी है| काल अभी तुम ठहरो ज़रा  कुछ काम अभी तक बाकी हैं| तुझसे हारना बाकी है| तुझको ही हराना बाकी है| काल अभी तुम ठहरो ज़रा कुछ नाम करना बाकी है| इतिहास के पन्नों पर अपनी  ...

दानवीर

दान धरम का मूल मंत्र है शुभ फल देने वाला|  सभी कष्ट,दु:ख पीड़ाएँ और विपदा हरने वाला|  दान धरम करते जो निस दिन,सुखी वही होते हैं|  परहित और उपकार हेतु अपना स्वयस्व देते हैं| वीर सूर वो नहीं समर में जो भीषण लड़ता है| शत्रु दलों को हरा युद्ध में कीर्ति अर्जित करता है| वीर वही सच्चा है जो दानी है, परित्यागी है| परहित को जो दान करें, वो मनुज बड़ा भागी है| रंतिदेव हो या कि दधीचि, या कि कर्ण बलशाली| दानवीर ये सबसे बढ़कर, परित्यागी हितकारी| जब जब जग में दानवीर को याद किया जाता है| इन्ही पुन्य विभूतियों का नाम याद आता है| रंतिदेव ने दिया दान निज कर से अन्न की थाल| तथा दिया दधीचि ने परहित अपनी अस्ति का जाल| दानवीर निकला राधेय जो दिया कवच कुण्डल है | होकर लहू लुहान स्वयं है किया दान अमर है| सच है एक न एक दिन सबको त्याग करना पड़ता है| परहित के लिए इस जग में स्वयं जलना पड़ता है| ऐसे ही नहीं होते इस जग में कीर्ति गाने वाले| दूसरों की प्रशंसा में कुछ गीत सुनाने वाले| जग में सबसे पूजित वही है, जो दानी, त्यागी है| करता जो परार्थ कर्म ह...

रूके रहेंगे, कहोगे जब तक..

रूके रहेंगे, कहोगे जब तक  झुके रहेंगे, सहेंगे तब तक  प्रतीक्षा में अब भी बैठे हैं  मिल ना जाये न्याय जब तक| मगर बताओ सहे कब तक  घात जो हर दिन लगता रहता है  कहो चुप हम रहें कब तक  सम्मान को जो हर दिन ठेस लग रही है| औरत, लड़की, बच्ची-किसी को ना बख्शा  हर किसी की अस्मिता लूटी जा रही है  एक समाज जो कभी इंसानों का था  आज हैवानों का जमघट बनता जा रहा है| कहो आखिर कहाँ गई इंसानियत  हर बात को तो मज़हब का रंग चढ़ा दिया  कहो क्या मोल लगाया है जिंदगियों का  सियासत में सब कुछ दाव पर लगा दिया| कहो ये व्यापार देखे कब तक  इंसानियत की हार सहे कब तक  गुहार लगाते रहेंगे, विरोध करते रहेंगे  मिलेगा नहीं न्याय जब तक| -रजत द्विवेदी