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मेरा प्रतिबिंब..

उज्ज्वल मन, सुंदर शरीर, 
जिसे देख मन होता अधीर।
सब हांथ है, फिर भी फ़कीर,
मुख पर नहीं तनिक भी पीर।
ये कौन हृदय से है वीर? 
बुद्धि से जो है अति गंभीर।

विचलित ना होता पीड़ाओं से,
मुख मोड़ता नहीं विपदाओं से।
हो अडिग सब कुछ सहता है,
बंधता नहीं बाधाओं से।
है निपुण वीर कलाओं से
रण में, रण की क्रीड़ाओं में।

जीवन को जीता हंस हंस कर,
जीवन से जीतता है लड़कर,
औरों को चाहता निश्छल हो,
करता है प्रेम जो मन भरकर।
गम में मुस्कुराता जी भरकर,
शीतल भी और है आग प्रखर।

ये विचित्र छवि है दूर कहीं,
आंखों में मेरे जो आन बसी।
मेरी ये कल्पना, मैं ना सही,
है मगर प्रतिबिंब ये मेरा ही।
है धुंधला पड़ा, जो सच नहीं,
है छिपा हुआ जो मुझमें ही।

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इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi

वीर सुभाष तेरी जय हो ।

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