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मेरा प्रतिबिंब..

उज्ज्वल मन, सुंदर शरीर, 
जिसे देख मन होता अधीर।
सब हांथ है, फिर भी फ़कीर,
मुख पर नहीं तनिक भी पीर।
ये कौन हृदय से है वीर? 
बुद्धि से जो है अति गंभीर।

विचलित ना होता पीड़ाओं से,
मुख मोड़ता नहीं विपदाओं से।
हो अडिग सब कुछ सहता है,
बंधता नहीं बाधाओं से।
है निपुण वीर कलाओं से
रण में, रण की क्रीड़ाओं में।

जीवन को जीता हंस हंस कर,
जीवन से जीतता है लड़कर,
औरों को चाहता निश्छल हो,
करता है प्रेम जो मन भरकर।
गम में मुस्कुराता जी भरकर,
शीतल भी और है आग प्रखर।

ये विचित्र छवि है दूर कहीं,
आंखों में मेरे जो आन बसी।
मेरी ये कल्पना, मैं ना सही,
है मगर प्रतिबिंब ये मेरा ही।
है धुंधला पड़ा, जो सच नहीं,
है छिपा हुआ जो मुझमें ही।

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