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घर की ओर जाने वाली सबा....

घर की ओर जाने वाली सबा ये सदाएं लेती जा,
मेरी इक छोटी निशानी घर वालों को देती जा।
घर का वो अंगान आज भी मुझको याद आता है।
खेल खेलता बचपन मेरी आंखों को तर कर जाता है।

एक नज़र घर के द्वारे पर जो पहले टिक जाती थी।
दूर से कहीं पापा के स्कूटर की आवाज़ आती थी।
भागे भागे घर के द्वारे पर आकर रुक जाता था।
आंखों में पापा से मिलने का उमंग भर जाता था।

आंख मिचौली कर मां से जब रसोई में घुस जाता था।
और चुपके से दूध में से मलाई चुरा चुरा कर खाता था।
मां फ़िर रंगे हांथ पकड़ कर डांट बहुत सुनाती थी।
फिर ख़ुद ही मलाई में मिश्री घोल मुझे खिलाती थी।

भाई छोटा लड़ता बहुत था, मुझे बहुत सताता था।
ख़ुद बच बच कर हर इक बात मुझ को ही फंसा था।
मगर कभी जब आए विपद तो मेरा साथ निभाता था।
मेरी खातिर वो दुनिया में हर किसी से लड़ जाता था।

आज भी हैं सब ऐसे ही, ऐसे ही साथ निभाते हैं।
मगर हाय ये मीलों की दूरी, साथ नहीं रह पाते हैं।
त्योहारों में, कुछ मौकों में ही हम अब मिल पाते हैं।
जीवन भर का प्रेम सारा चंद घंटों में निभाते हैं।

मगर सबा ये खबर आज भी तू घर को देकर आना।
जहां रहूं मैं, मुझको तो हर बार है घर को ही आना।
जितनी दूरी बढ़ेगी घर से, प्रीत बढ़ती जायेगी।
अपने प्रेम की गहराई को दूरी कहां आंक पायेगी।

- रजत द्विवेदी




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