Skip to main content

जगतपति


मैं कोटि कोटि, ये अनंत विस्तार है मेरा,
हिम से जलधी तक समग्र संसार है मेरा।
है रूप मेरा जिसमें जग दर्प दिखता है,
मेरे नेत्रों में ही प्रकाश जगता है।

मेरे अधरों पर ही खिलती हैं लताएं,
सजती माथे पर ज्योतित दीपशिखायें।
सांसों में उठता ज्वार न बंध सकता है,
आंखों में पलता अंगार न बुझ सकता है।

मैं रोक सकूं पृथ्वी की चाल, गति को,
दूं दान ज्ञान का जड़ मूड़ मति को।
मैंने ही जग को गीता ज्ञान दिया है,
अर्जुन को उसकी पहचान दिया है।

मैं स्वयं वेद हूं, मानस भी स्वयं मुझी में,
गीता, पुराण का तत्व बसा है मुझमें।
लेता हूं जब जब जन्म नया मैं जग में,
सुर हर्षित सभी होते अनंत उस नभ में।

शंकर का मुझ में ही प्रतिबिंब दिखता है,
मेरे संकेत से ही संहार जगता है।
और मेरी इच्छा से ही सृष्टि चलती है,
सारे जग में जीवन कलियां खिलती हैं।

ले धार मुझे तू अब अपने इस मन में,
होगा न भय, न संशय फिर कुछ जीवन में।
तू मेरा है एक अंग, हूं शर मैं तेरा,
जन्मों का नाता है तेरा और मेरा।

बस रूप नए नए लेकर हम आते हैं,
पर प्रेम एक दूजे के हिय ही पाते हैं।
सारे जग का मैं स्वामी, सखा हूं ये तेरा,
तेरे हिय नाम बसा है हरदम मेरा।

पहचान अपने मन को, मुझे पाएगा,
फिर नहीं कभी तू मन में दुख पाएगा।
करता रहेगा जब भी सुमिरन मेरे,
पाएगा मुझको निकट सदा ही तेरे।


- रजत द्विवेदी

Comments

Popular posts from this blog

कातिब..

कातिब ये लिखे अब कहानी कौन सी? अब बची है भला इश्क़ की निशानी कौन सी? अब बची है चिंगारी कौन सी इंकलाब की? सूरत बदलती दिख रही है चिराग़ की। उठी नहीं अब तक एक भी आग जिस्म में, ना इश्क़ गहरा हुआ, ना हम ही डूबे उसमें। ना वजूद को ठेस लगी, ना दिल पर बात आई, जाने बगावत की हारी हुई कौन सी बिसात आई? कातिब किसकी लिखे जिंदगानी कौन सी? फ़ैज़ की या लिखे भगत की कहानी कौन सी? ना कलम को पता, ना कातिब को इल्म है, स्याह उड़ेल कर छोड़नी है काग़ज़ पर निशानी कौन सी? - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/kaatib-ye-likhe-ab-khaanii-kaun-sii-ab-bcii-hai-bhlaa-ishk-pa1t4

विश्वबंधु

मैं शाश्वत रूप शूरता का, जग को ये दान करता हूं। जिनमें ना हो कुछ बल उनको अग्नि प्रदान करता हूं। मेरी ही दिव्य ज्योतियों से ये वन्य कुसुम खिलते हैं। धरती पर श्वास बहा करती, जीवन सबके चलते हैं। मैंने ही तो सारे जग को जीवन जीना सिखलाया। "वसुधैव कुटुंबकम्" का मैंने प्रचार फैलाया। पश्चिम को पूरब से जोड़ा, पृथ्वी को एक किया है। "हिन्दू" क्या होता है सच्चा, जग ने तब बोध किया है। जब विश्व खड़ा था महायुद्ध की भीषण अभिलाषा से। मैंने दिखलाया था भारत का मुख उन्हें बड़ी आशा से। जो देश सभी उस समय धर्म के नाम पर ही लड़ते थे। रंग, जात और मूल से ही जग को बांटा करते थे। उनको मैंने ही "विश्व बंधुत्व" का आयाम दिया था। भारत को "विश्व गुरु" का ही मैंने तब नाम दिया था। मेरे "हिन्दू" होने पर मैंने, खुद को अभिमान दिया था। "हिंदुत्व मात्र एक धर्म नहीं"- जग को पैग़ाम दिया था। हिंदुत्व स्वयं में धर्म नहीं, जीवन जीने की शैली है। पर हाय! आज इस राजतंत्र में क्यों इतनी ये मैली है? हिन्दू की असल पहचान जो थी, उसको ये सत्ता खा बैठी। नफ़र...

इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi