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करुणा..

नयन सेज पर उभरे आंसू, भींज गई है हिय की भूमि। मृदुभावों का बादल आया, बरस रही करुणा की बूंदे। निर्मोही मन के प्रदेश में, आज प्रेम का सावन आया। दयाहीन को दया मिली है, मृतकों ने नया जीवन पाया। कौन मधुरता भरा लेप यह आज मन पर लगाता है। घृणा से पीड़ित इस तन को जो शीतलता पहुंचाता है। कौन देवदूत उतरा है आज हमारे आंगन में? जिसने प्रेम सुधा बरसाई मरुभूमि से इस तन में? कौन भगीरथ आज पुनः जग के कल्याण हेतु आया। जिसने इस बंजर भूमि पर करुण गंगा को बहाया? - रजत द्विवेदी

राम कहां है?

कहां और अब राम वनों में रह रहकर पलता है, माता और पिता की इच्छा का जो पालन करता है? नाम भले ही राम धरा तो क्या गुण भी अपनाए हैं? राम नाम का चोगा ओढ़े बस पाखंड दिखाए हैं। कहां आज कोई भाई अब भाई पर स्नेह बरसाता है, अपने सहोदर से ही क्यों जाने वो घृणा दिखाता है। हाय राम! ये किस समाज में आज तुम्हें भजते हैं सब? घर को तोड़ मकान बनाए, "राम" उसी पर लिखते सब। ऐसे ही गर चलता रहा तो एक दिन वो भी आयेगा, भाई से भाई का रिश्ता बस व्यापार रह जायेगा। राम अपने नाम को बचा लो धरती पर उपकार करो। ऐसे संबंधों से बचाने फिर से मनुष्य अवतार धरो। -रजत द्विवेदी

पशुता

जड़ चेतन में भेद नहीं अब, दोनों दिखते एक समान। शुरू हो गया पतन जगत का, हो कैसे इसका उत्थान? जड़ ज्यों बिन चेतना के मूड़ मति होता जग में, अब सचेत मानव भी वैसा ही होता जा रहा जग में। सविवेक को त्याग चुका नर, औरों के दम पर चलता है। स्वयं आंक ना सकता सच को, झूठो हामी भरता है। कठपुतली बन गया समाज का, रोज़ नचाया जाता है। कितना विवश हो चुका है वह ये भी समझ न पाता है। हे विधाता, क्यों आख़िर तेरा नर है लाचार यहां? पग में बांध लिए हैं लोहे, अब जाए तो जाए कहां? पशु और जड़ की तरह ही मानव भी मतिहीन हुआ। बुद्धि,बल का स्वामी मानव आज पशुता में लीन हुआ। सृष्टि के आरम्भ मात्र में बस मानव को ज्ञान मिला। चिंतन, मनन, वाचन की शक्ति और स्वाभिमान मिला। मगर आज वह अन्य पशुओं की भाती क्यों हो रहा है? -रजत द्विवेदी

विश्वबंधु

मैं शाश्वत रूप शूरता का, जग को ये दान करता हूं। जिनमें ना हो कुछ बल उनको अग्नि प्रदान करता हूं। मेरी ही दिव्य ज्योतियों से ये वन्य कुसुम खिलते हैं। धरती पर श्वास बहा करती, जीवन सबके चलते हैं। मैंने ही तो सारे जग को जीवन जीना सिखलाया। "वसुधैव कुटुंबकम्" का मैंने प्रचार फैलाया। पश्चिम को पूरब से जोड़ा, पृथ्वी को एक किया है। "हिन्दू" क्या होता है सच्चा, जग ने तब बोध किया है। जब विश्व खड़ा था महायुद्ध की भीषण अभिलाषा से। मैंने दिखलाया था भारत का मुख उन्हें बड़ी आशा से। जो देश सभी उस समय धर्म के नाम पर ही लड़ते थे। रंग, जात और मूल से ही जग को बांटा करते थे। उनको मैंने ही "विश्व बंधुत्व" का आयाम दिया था। भारत को "विश्व गुरु" का ही मैंने तब नाम दिया था। मेरे "हिन्दू" होने पर मैंने, खुद को अभिमान दिया था। "हिंदुत्व मात्र एक धर्म नहीं"- जग को पैग़ाम दिया था। हिंदुत्व स्वयं में धर्म नहीं, जीवन जीने की शैली है। पर हाय! आज इस राजतंत्र में क्यों इतनी ये मैली है? हिन्दू की असल पहचान जो थी, उसको ये सत्ता खा बैठी। नफ़र...

विद्युत की इस चकाचौंध में.....

विद्युत की इस चकाचौंध में देख दीप की लौ रोती है। बहु नयनों में अंधियारा है, चंद घरों में ज्योति है। यह समाज क्यों गर्त में पड़ा, सुख की तान सुनाता है। थोथी बात बखाने ख़ुद की, तम से घिरता जाता है। आज पतन की राह पर चला है कारवां मानव का। भूख से ग्रसित तड़प रहे घर, खुल गया मुख दानव का। नगर के एक छोर पर देखो भात दाल ना रोटी है। दूजी ओर लुटाते देखो व्यर्थ में ही लोग मोती है। ये कैसा है फ़र्क जगत का एक हांथ में है लक्ष्मी, दूजे में है लिए हुए जो बिलख रही भूखी बच्ची। कहो क्यों भला नियति की झोली इतनी छोटी है। एक वर्ग को कंकड़ देता, दूजे को दे मोती है। विद्युत की इस चकाचौंध में देख दीप की लौ रोती है। बहु नयनों में अंधियारा है, चंद घरों में ज्योति है। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/vidyut-kii-ckaacaundh-men-dekh-diip-kii-lau-rotii-hai-bhu-yh-r8tsi

कल्की अवतार

अंत विश्व का आने को है, पाताल में धरा समाने को है। है पाप चरम पर आ पहुंचा, ये कलियुग के अंत की है कथा। ले समय को अपना साक्ष मान, करता हूं कलियुग का बखान। है कल्पना ये भावी दुनिया की, जिसमें होगा बस छल महान। भाई से भाई लड़ता है, अब पिता पुत्र से डरता है। माता तिरस्कृत होती है। नर नारी को बेचा करता है। हत्याएं चरम पर आ पहुंची, संस्कृति गर्त में डूब चुकी। ईश्वर के नाम पर लड़ते सब, तलवार से खेला करते सब। आडंबर के पोंगे पंडित हैं, निष्क्रिय थके से क्षत्रिय हैं। बनिये बाज़ार में बिक गए, श्रम से श्रमिक घबराते हैं। पढ़ने को कोई नाम नहीं, इस सृष्टि पर अब राम नहीं। बस राम राम सब करते हैं, मन में न राम को धरते हैं। बालाएं बिकती चौबारे पर, काली सड़कें, अंधियाले घर। नर जो अन्याय से लड़ता है, बस खड़ा खड़ा बिक जाता है। कोई नहीं "सत्यधारी" यहां, बस दिखते "सत्ताधारी" यहां। सत्ता के लिए बस लड़ते हैं, निर्मम हत्याएं करते हैं। करते बदनाम ये "राम" का नाम। धर्म पर लड़ना इनका काम। गंगा मां सूखी जाती है। जनता ना तरस दिखाती है। हिमरा...

कामायनी

ओ जीवन की अमित कल्पना, ओ माया की सुंदर प्रतिमा। जग में नहीं है कोई ऐसा, तुझ सम जिसकी हो प्रतिभा। तू अनुपम, तू सुधामई, तू नैतिकता की है गरिमा। ख़ुद की तुलना करते सब तुझसे, तुझको दूं किसकी उपमा? चिंता, आशा, श्रद्धा, शोक, विभोर, ईर्ष्या, और इच्छा। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, माया, जड़ता और विद्या। हे "कामायनी"! ये सभी तत्व एक तेरा ही तो दर्पण हैं। मानव का जीवन जिन में बंध बन गया स्वयं एक उलझन है। तुझ में है दर्पित विवशता मन की, तन की पीड़ाएं अंकित हैं। तेरी आदतों में जीवन की दुविधाएं सारी चिंहित हैं। हे "कामायनी"! तू नारी एक मानव का चित्रण करती है। खालीपन जो है उसका, उसमें प्रकाश तू भरती है। मानव कितना सरल जटिल है, तुझसे मापा जाता है। तेरे सभी तत्वों से ही एक मनुज को रूप मिल पाता है। हे "कामायनी"! तू ही तो आधार है इस सारे जग का। तेरे रूप की पुण्य विभा से ही संसार है जगमग सा। - रजत द्विवेदी