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स्वावलोकन





-रजत द्विवेदी

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आल्हा वीर रस

आवा बन्धु,आवा भाई सुना जो अब हम कहने जाए। सुना ज़रा हमरी ये बतिया, दै पूरा अब ध्यान लगाय। कहत हु मैं इतिहास हमारा जान लै हो जो जान न पाए।   जाना का था सच वह आपन जो अब तक सब रहे छुपाय। जाना का था बोस के सपना,जो अब सच न है हो पाए। जान लो का था भगत के अपना, जो कीमत मा दिए चुकाय। जाना काहे आज़ाद हैं  पाये वीर गति अरु बीर कहाय। जान लो काहे शेर मर गए ,हो गए गीदड़ सिंह कहाय ।।१॥ ये आल्हा बरनन है उनखर,जो भारत के लाल कहाय। बड़ी अनोखी उनखर गाथा,हमके उनखर याद दिलाय। उन जोधन के राष्ट्रप्रेम के कोउ प्रेमी पार न पाए। ऊ मतवाले अलबेले थे,अपना ऋण जे दिए  चुकाय। पहिन लिहिन सब कफ़न बसंती, वीरगति को पाना चाय। एक से एक भयंकर जोधा,बरछी तीर कटार के नाइ। एक से एक विद्वान पुरोधा जो भक्ति का गीत सुनाय ।।२॥ बाजत रहे संख समर के,देत सुनाई वीर पुकार। रणभेरी गूँजी थी अइसन,उत्तेजित होते नर नार। करमभूमि फिर धरती बन गई ,होवत रहे वार पे वार। ...

सुनो ज़रा क्या कहते हैं................जब मैंने उनसे ये पूंछा ।

सुनो ज़रा क्या  कहते हैं................जब मैंने उनसे ये पूंछा । अजय खड़ा तू ढाल हिमालय किसकी रक्षा करता है ? नभचुम्भी हे भाल हिमालय किसकी गाथा गाता है ? शीशशिखर तू बना हुआ है सीना ताने खड़ा हुआ है। आखिर वह क्या है तू जिसका मान बढ़ाने अड़ा हुआ  है ? सुनो ज़रा क्या कहता है हिमराज जब मैंने ये पूंछा । मैं हिमराज हिमालय हूँ भारत के मस्तक की शोभा। मैं गिरिराज हिमालय हूँ भारतीय संस्कृति की आभा । मैं ढाल हिमालय  भारत का जो रक्षा करता सदियों से उस देवभूमि भारत की जो जगतगुरु है सदियों से । मैं हिमराज हिमालय हूँ जिसके निर्मल हिम पर्वत से बहती असंख्य अविरल नदियाँ। जो अपना शीतल पानी दे भारत को दान हैं करतीं जो जीवन की लिए  सुखदाई है जो भारत में कलकल बहकर समृद्ध सौहार्द लाई है । मैं बड़भागी हिमालय  हूँ जिस पर शंकर का आसन है मैं कैलाश हिमालय हूँ जिस पर शिव करते शासन हैं । सुनकर हिमराज की  यह वाणी जिसने  भारत कथा  बखानी मैं आगे बढ़ कर चला गया । चलते चलते जो  मुझे मिले ...

वीर सुभाष तेरी जय हो ।

वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो। वीर  सुभाष  तेरी जय हो । उपकारी तेरी करनी  की कीरत यहाँ अजय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  फूँक दिया था जो  तूने  वह बिगुल क्रांति का जग में।   बसा लिया जो तूने  रंग तिरंगा रग  रग में।  निकल पड़ा  था तू जग में  करने भारत का  उद्धार आज़ाद  कराने  भारत को  करने मातृभूमि पर उपकार  तेरी उस कोशिश की जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।    अपनी  पहचान छुपाकर के  तूने भारत का नाम  किया ।  अपना जीवन त्याग कर  तूने भारत भविष्य रचा ।  अधीर हो उठी जनता आज़ादी का यह रस्ता जचा । कर डाला तूने वो कमाल जिसपर जग को विस्मय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो । -रजत द्विवेदी