मैत्री का मूल्य चुकाऊं कैसे?
उस पर मैं पीठ फिराऊं कैसे?
केशव, सुयोधन वह भ्राता है,
जिससे जन्मों का नाता है।
मुझ पर न दया जग करता था।
केवल कटाक्ष ही करता था।
तब एक सुयोधन ही तो था,
जिसको मैं हृदय से प्रिय रहा।
माना सहोदर पांडव मेरे।
हैं अजय वीर बांधव मेरे।
दुर्योधन पर है उनसे बढ़कर।
सुख दुःख का मेरा है सहचर।
मैं उसका त्याग करूं कैसे?
सुख में मैं स्वास भरूं कैसे?
दुर्योधन बस एक सहारा है।
मेरे हिय का उजियारा है।
वरना क्या बस तम ही है हिय में।
है घृणा और क्रंदन हिय में।
केशव, जो सुयोधन ना होता,
तो कैसे फिर ये कर्ण जीता?
अब रोम रोम बस उसका है।
जीवन पर हक अब उसका है।
मरना जीना अब सब उस संग।
हैं एक हृदय, चाहे दो अंग।
केशव, आप तो जग के स्वामी।
घट घट में बसते अन्तर्यामी।
जिस पक्ष भी आप हो जायेंगे,
वो सदा सुयश ही पायेंगे।
पांडवों को कौन हरा सकता?
हरि जहां, वहां काल कब आ सकता?
किन्तु सुयोधन अकेला है।
उस संग ना महाभट मेला है।
मैं ही उसका सेवक और मित्र।
मैं ही वीरता का शुभ चित्र।
मुझको ही देख वह जागा है।
वरना मुझसा ही अभागा है।
दुर्भाग्य भला और क्या होगा?
नारायण से मुझे लड़ना होगा?
किन्तु यह पीर सह जाऊंगा।
केशव तुमसे भी लड़ जाऊंगा।
क्यों आज मगर आए स्वामी?
क्यों मेरा भेद बताए स्वामी?
मैं तो अब तक था धनी रहा।
पांडवों के लिए संचित थी घृणा।
किन्तु अब कैसे लडूंगा मैं?
अर्जुन का भेदन करूंगा मैं?
क्यों हाय विधाता क्रूर मुझसे?
माता और भ्राता हैं दूर मुझसे?
सूरज की गलती का ताप क्यों मैं?
माता कुंती का पाप क्यों मैं?
क्या दोष मेरा या पांडवों का?
क्यों भाईयों से नाता टूटा?
यह विकट जगत की माया है।
कुछ मुझे समझ ना आया है।
दोषी सूरज तो चलता है।
निर्दोष कर्ण क्यों जलता है?
कब सच का भार धरेगा जग?
कब मेरा सत्कार करेगा जग?
अब छोड़ यदि रण जाऊंगा।
मैं ही तो कायर कहाऊंगा।
केशव, कितने अपमान सहूं?
सुख में पलकर मैं कैसे जिऊं?
केशव, ये प्रस्ताव आप ले जाओ।
मेरे बिन ही पांडव घर जाओ।
अब रण में मिलन होगा अपना।
लड़कर ही सफल होगा सपना।
दुर्योधन का कर्ज़ चुकाऊंगा।
लड़ते लड़ते मर जाऊंगा।
किन्तु हे नाथ, एक वचन दीजिए।
इतना उपकार मुझ पर कीजिए।
रण खत्म या जब मेरा हो मरण,
तब तक ना किसी से कहना तुम।
पांडव यदि जान गए मुझको।
भ्राता यदि मान गए मुझको।
तो युद्ध त्याग बैठ जायेंगे।
वो धर्म कहां से लायेंगे!
द्रौपदी का प्रण झुठलाएगा।
हर दुशासन निर्भीक हो जायेगा।
फिर जग में न नारी बच पायेगी।
कब तक केशव को बुलाएगी?
वो पांचाली थी, तुम थे जिस संग।
या सीता के लिए राम थे तुम।
पर कलियुग जब आ जायेगा,
तो कौन नारी को बचायेगा?
केशव हर नारी सीता है।
पावन सत्तचित पुनीता है।
पर जगत में राम नहीं बाकी।
या कोई घनश्याम नहीं बाकी।
युधिष्ठिर जब जुआं लगा सकता,
तो कहां कोई और न आ सकता।
धर्मराज हार जब सकता है,
तो कहां और कोई बच सकता है।
केशव, यह रण जगत का विधाता है।
इसमें ही धर्म जन्म पाता है।
यदि मेरे कारण पांडव हारे,
तो जग जी पायेगा किस धर्म के सहारे?
- रजत द्विवेदी
उस पर मैं पीठ फिराऊं कैसे?
केशव, सुयोधन वह भ्राता है,
जिससे जन्मों का नाता है।
मुझ पर न दया जग करता था।
केवल कटाक्ष ही करता था।
तब एक सुयोधन ही तो था,
जिसको मैं हृदय से प्रिय रहा।
माना सहोदर पांडव मेरे।
हैं अजय वीर बांधव मेरे।
दुर्योधन पर है उनसे बढ़कर।
सुख दुःख का मेरा है सहचर।
मैं उसका त्याग करूं कैसे?
सुख में मैं स्वास भरूं कैसे?
दुर्योधन बस एक सहारा है।
मेरे हिय का उजियारा है।
वरना क्या बस तम ही है हिय में।
है घृणा और क्रंदन हिय में।
केशव, जो सुयोधन ना होता,
तो कैसे फिर ये कर्ण जीता?
अब रोम रोम बस उसका है।
जीवन पर हक अब उसका है।
मरना जीना अब सब उस संग।
हैं एक हृदय, चाहे दो अंग।
केशव, आप तो जग के स्वामी।
घट घट में बसते अन्तर्यामी।
जिस पक्ष भी आप हो जायेंगे,
वो सदा सुयश ही पायेंगे।
पांडवों को कौन हरा सकता?
हरि जहां, वहां काल कब आ सकता?
किन्तु सुयोधन अकेला है।
उस संग ना महाभट मेला है।
मैं ही उसका सेवक और मित्र।
मैं ही वीरता का शुभ चित्र।
मुझको ही देख वह जागा है।
वरना मुझसा ही अभागा है।
दुर्भाग्य भला और क्या होगा?
नारायण से मुझे लड़ना होगा?
किन्तु यह पीर सह जाऊंगा।
केशव तुमसे भी लड़ जाऊंगा।
क्यों आज मगर आए स्वामी?
क्यों मेरा भेद बताए स्वामी?
मैं तो अब तक था धनी रहा।
पांडवों के लिए संचित थी घृणा।
किन्तु अब कैसे लडूंगा मैं?
अर्जुन का भेदन करूंगा मैं?
क्यों हाय विधाता क्रूर मुझसे?
माता और भ्राता हैं दूर मुझसे?
सूरज की गलती का ताप क्यों मैं?
माता कुंती का पाप क्यों मैं?
क्या दोष मेरा या पांडवों का?
क्यों भाईयों से नाता टूटा?
यह विकट जगत की माया है।
कुछ मुझे समझ ना आया है।
दोषी सूरज तो चलता है।
निर्दोष कर्ण क्यों जलता है?
कब सच का भार धरेगा जग?
कब मेरा सत्कार करेगा जग?
अब छोड़ यदि रण जाऊंगा।
मैं ही तो कायर कहाऊंगा।
केशव, कितने अपमान सहूं?
सुख में पलकर मैं कैसे जिऊं?
केशव, ये प्रस्ताव आप ले जाओ।
मेरे बिन ही पांडव घर जाओ।
अब रण में मिलन होगा अपना।
लड़कर ही सफल होगा सपना।
दुर्योधन का कर्ज़ चुकाऊंगा।
लड़ते लड़ते मर जाऊंगा।
किन्तु हे नाथ, एक वचन दीजिए।
इतना उपकार मुझ पर कीजिए।
रण खत्म या जब मेरा हो मरण,
तब तक ना किसी से कहना तुम।
पांडव यदि जान गए मुझको।
भ्राता यदि मान गए मुझको।
तो युद्ध त्याग बैठ जायेंगे।
वो धर्म कहां से लायेंगे!
द्रौपदी का प्रण झुठलाएगा।
हर दुशासन निर्भीक हो जायेगा।
फिर जग में न नारी बच पायेगी।
कब तक केशव को बुलाएगी?
वो पांचाली थी, तुम थे जिस संग।
या सीता के लिए राम थे तुम।
पर कलियुग जब आ जायेगा,
तो कौन नारी को बचायेगा?
केशव हर नारी सीता है।
पावन सत्तचित पुनीता है।
पर जगत में राम नहीं बाकी।
या कोई घनश्याम नहीं बाकी।
युधिष्ठिर जब जुआं लगा सकता,
तो कहां कोई और न आ सकता।
धर्मराज हार जब सकता है,
तो कहां और कोई बच सकता है।
केशव, यह रण जगत का विधाता है।
इसमें ही धर्म जन्म पाता है।
यदि मेरे कारण पांडव हारे,
तो जग जी पायेगा किस धर्म के सहारे?
- रजत द्विवेदी
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