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नियति

है नहीं यह वही ठोर जिस पर मैं जलता था।
अवनी की बनती अंगीठी जब मैं चलता था।
पांव पर जब छालों का श्रृंगार होता था।
राह पर नित कांटों का भंडार होता था।
मौसमों में एक अपनी जलन होती थी।
देह में पर ख़ुद-ब-ख़ुद एक गलन होती थी।
छूटता था जो पसीना मुझे भिंगोता था।
मेरे हांथों में बस बहता पानी होता था।

अब मगर क्या हो गया इस ठोर पर आकर?
पांव के नीचे हैं मिलते फूल भर भरकर।
जैसे नियति मुझ पर कोई दया दिखाती है।
मुझको मेरी दुर्बलता का बोध कराती है।
मैं दया का पात्र तो कभी नहीं रह चुका हूं।
हर एक पीड़ा को बहादुरी से मैं सह चुका हूं।
तो क्यों नियति करुणा का मुझे विष पिलाती है?
मुझको अपने सामने क्यों यूं झुकाती है?

- रजत द्विवेदी
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इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi

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आसमान से ऊँचा......

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