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ज्योतिकलम

मैं ज्योतिपुंज,सारे जग का उजियारा,
मुझसे ही तो हर बार तिमिर है हारा।
मेरे मुख में ही तो प्रकाश पलता है,
मेरी विभाओं से ही सूरज जलता है।

नभ में फैली जो अनंत तक कनक छटा है,
मेरे दिनकर की ही ये पुण्य प्रभा है।
धरती पर नित जो जीव जंतु चलते हैं
मेरे प्रकाश ही भरकर पलते हैं।

मैं कवि निमित्त जो रहता सदा प्रगति में,
उजियारा भरता जीवन के घोर तिमिर में।
कब काल के रोका कहो कभी मैं रुका हूं?
या नतमस्तक हो तम के आगे मैं झुका हूं।

मेरी कलम में विपलभ की है चिंगारी,
हर बार खड़ग पर पड़ी कलम ही भारी।
क्रान्ति का हूं मैं बीज, छिपा धरती में,
हल हांको तो हलचल होती धरती में।

फिर एक रूप ले वीरभद्र आता हूं,
सारी सृष्टि का समग्र नाश करता हूं।
फिर सृजन बीज बनकर जग में पलता हूं,
जग को जीवन का दान अमर करता हूं।


-रजत द्विवेदी 

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