अंत विश्व का आने को है, पाताल में धरा समाने को है। है पाप चरम पर आ पहुंचा, ये कलियुग के अंत की है कथा। ले समय को अपना साक्ष मान, करता हूं कलियुग का बखान। है कल्पना ये भावी दुनिया की, जिसमें होगा बस छल महान। भाई से भाई लड़ता है, अब पिता पुत्र से डरता है। माता तिरस्कृत होती है। नर नारी को बेचा करता है। हत्याएं चरम पर आ पहुंची, संस्कृति गर्त में डूब चुकी। ईश्वर के नाम पर लड़ते सब, तलवार से खेला करते सब। आडंबर के पोंगे पंडित हैं, निष्क्रिय थके से क्षत्रिय हैं। बनिये बाज़ार में बिक गए, श्रम से श्रमिक घबराते हैं। पढ़ने को कोई नाम नहीं, इस सृष्टि पर अब राम नहीं। बस राम राम सब करते हैं, मन में न राम को धरते हैं। बालाएं बिकती चौबारे पर, काली सड़कें, अंधियाले घर। नर जो अन्याय से लड़ता है, बस खड़ा खड़ा बिक जाता है। कोई नहीं "सत्यधारी" यहां, बस दिखते "सत्ताधारी" यहां। सत्ता के लिए बस लड़ते हैं, निर्मम हत्याएं करते हैं। करते बदनाम ये "राम" का नाम। धर्म पर लड़ना इनका काम। गंगा मां सूखी जाती है। जनता ना तरस दिखाती है। हिमरा...
कलम की स्याही से हर पल नया अंगार लिखता हूँ