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हिमालय

हिमकिरिट शुभ शैल शिखर पर, विस्तृत फैले अम्बर पर से, आता एक स्वर्णिम प्रकाश है। कंचन जैसा चमक रहा जो हिम से ढका शिव का कैलाश है। कितनी विभाओं से सुशोभित, देखो आज मेरा आकाश है। मैं 'भारत', गंगा का पुत्र हूं, मुझको हिमालय पर नाज़ है। सदियों से अडिग खड़ा हिमालय  मेरी रक्षा का करता है ये। कोटि कोटि मुनियों को आश्रय देता, शिव को मस्तक पर धरता है ये। गंगा, सिंधु और ब्रह्मपुत्र को जन्म दिया करता है ये। मुझ भारत की धरती को जीवन का दान दिया करता है ये। बड़भगी मैं हूं जिसके ऊपर हिमालय खड़ा है अडिग अचल। कठिन समय में जिससे मुझको मिलता जीवन का संबल। हिम बिना भारत कुछ नहीं, हिमालय है प्रतिबिंब मेरा। जब तक हिमालय जीवित है, तब तक रहेगा अस्तित्व मेरा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/himkiritt-shubh-shail-shikhr-pr-vistrt-phaile-ambr-pr-se-ek-oaepd

अलगाव

इक शजर से टूट कर गिरता उसी का अंग था, भेद क्या था उन में जो, वो एक जैसा रंग था। हो अलग जो वृक्ष से वो टहनी बलखाने लगी, इस तरह विद्रोह का भी एक अपना ढंग था। हां मगर चमकने लगा आलोक जब उसमें अलग, जीण वृक्ष से कुछ अलग दिखने लगा वह अंग था। कहने को तो गलत था कि शजर से जो अलग हुआ, हां मगर अलगाव से उसको मिला नया रंग था। कभी कभी पहचान बनाने के लिए ये चाहिए, हर दरख़्त की शाख को सब जुदा होना चाहिए। फिर पता चलती अकेले की अलग पहचान है, कौन कब तक को भला करता रहे अभिमान है। ज़र्रे ज़र्रे को हयात से कभी कभी रूठना चाहिए, हर किसी का किसी से कभी साथ छूटना चाहिए। जब मनुज होता अकेला, ख़ुद को है पहचानता, औरों की करुणा ठुकरा कर मान अपना जानता। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/ik-shjr-se-ttuutt-kr-girtaa-usii-kaa-ang-thaa-bhed-kyaa-thaa-n3uzg

आज़ाद

सिंघों की गर्जन के आगे, कब कौन भला कुछ कर सकता है? एक वीर सूरमा मौत से भी कब कहो कैसे डर सकता है? जो था "आज़ाद", "आज़ाद" ही है, वह किससे कहो बंध सकता है? जो जिया ज़िंदगी शेरों सा, वह कैसे दुबक कर रह सकता है। घिर गया स्वानों से लेकिन एक रोज़ वो वीर व्याघ्र फंस जाता है। किस और धरे आगे पग वो यह कुछ भी समझ न आता है। एक द्रोही अपने खेमे में से एक छल खेल कर जाता है। "आज़ाद" वीर का गोरों के हांथों दाव लगाता है। पर वाह! रे बीर बांकुरे तू, क्या अमर बलिदान तूने दिया। मां भारती के हित अर्पित निज जीवन का दान तूने दिया। है धन्य धरा, धन्य है जन जन, तूने भारत में जन्म लिया। इंकलाब की अग्नि को अपने लहू से पवित्र किया। -रजत द्विवेदी

निराला

अंबर का रुदन सुना मैंने, सागर का क्रंदन देखा है, उठती ज्वाला की लपटों में इस तन को जलते देखा है। मैं जा पहुंचा जब भीतर तम में, सूरज को ढलते देखा है, लेकर सहारा जुगनुओं का, चंदा को पलते देखा है। सहस्त्रों बार अग्नियों में एक शीत लहर को देखा है, असंख्य हृदय देखे जिनको हिम सा पिघलते देखा है। फिर कभी प्रेम में पड़े मन को बर्फ़ में गलते देखा है, और कभी क्रान्ति की ज्योति को, तम से निकलते देखा है। कभी साथ साथ चले हैं कदम, उन्हें एक सा ढलते देखा है, और कभी बाघियों से मन को अकेला चलते देखा है। संतों को क्षरा पूत बनते, तलवार उठाते देखा है, क्षत्रिय को खड़ग छोड़ करके साधू भी बनते देखा है। मैं आया तभी कलम लेकर, है लिखा जो भी कुछ देखा है, कुछ लिखे फसाने हैं कोरे, कुछ चिरंतन सत्य का लेखा है। मैं 'दिनकर' हूं, 'निराला' हूं, 'जय शंकर' का उजियाला हूं, मैंने तो बस वही लिख डाला है, जो कुछ जीवन में देखा है। -रजत द्विवेदी

ऐक्य भारत, एक भारत....

हिमकिरीट शुभ शैल शिखर, अनंत तक फैला जिसका अम्बर। भारत की है पहचान अमर, है खड़ा हिमालय अडिग होकर।  (१) हिम चीर निकल आई गंगा, धरती को पवित्र कर देती है। जन जन को शुद्धता दान करे, सबको जीवन वर देती है।         (२) होती है भोर आज़ानों से, शंकर, कृष्णा के गानों से। एक ओंकार अरदास और गिरिजाघर की आवाज़ों से।       (३) हर चार कोस पानी बदले, हर चार कोस बोली बदले। एक नद में जैसे मिलती धारें, वैसे ही भाषा का प्यार मिले।      (४) हिंदी तो मेरी माता है, पर उर्दू को मौसी कहता हूं। कभी छंद, दोहों में बंधता हूं, कभी नज़्मों में आवारा रहता हूं।  (५) कोई भेद नहीं है अंबर का, सब तारे नभ पर एक से हैं। कोई भेद नहीं मुझको स्वर का, सब भाषाएं बहनों सी हैं।           (६) कब अंबर बांट सका कोई? कब भाषा बांट सका कोई? जो डोर जुड़ी है प्रेम की, उस डोर को काट सका कोई?    ...

हिन्दू- मेरी पहचान

मैं तेजपुंज, तम में प्रकाश भरता हूं, जग को गीता का अमर दान करता हूं। मैं सिखलाता हूं जग को भाईचारा, सौहार्द और प्रेम से ही जग में उजियारा। मैं निर्गुण और सगुण सबका पंथी हूं, तुलसी, कबीर, रसखान, सूर संगी हूं। चल अचल सभी मेरे ही तो साथी हैं, 'हिन्दू' हूं मैं, मित्रता मेरी थाती है। मैंने ही तो सिंधु को ज्वार दिया था, मुझसे ही तो 'सिकंदर' हार गया था। मैंने ही तो 'भारत' को एक किया था, ले फूल हांथ, खड्गों को फ़ेंक दिया था। मैं हूं 'कौटिल्य', हूं 'चंद्रगुप्त' भी मैं ही, मैं ही 'आज़ाद', हूं 'भगत सिंह' भी मैं ही। मैं ही हूं वो अश्फाक जो अमर हुआ था, जिसने पुनर्जन्म में भारत को चुना था। मैं हूं 'सुभाष', जिसने सब भेद मिटाया, मज़हब को छोड़ मुल्क का गान सुनाया। जितने जग में सब पंथ और पंथी हैं, सब तो मेरे ही साथी हैं, संगी हैं। फिर क्यों हिन्दू का नाम आज मिटता है? क्यों हिन्दू को पहचान धर्म देता है? मैं सिंधुपति, इसलिए नाम हिन्दू है, सारे जग में जो प्रेम का मुख्य बिंदु है। जो ...

हिम टूट पड़ा भू मंडल पर.....

हिम टूट पड़ा भू मंडल पर... एक शीत लहर निराशा की, अंधियाली रातों में चल दी।  हैं क्षीण सर्दियों से ठिठुरती चारु की चंचल किरणें भी। पृथ्वी पर छाया एक कहर, हिम टूट पड़ा भू मंडल पर। तम और ज़रा गहराता है, कुछ भी अब नज़र न आता है। चन्द्रमा छिपा ही जाता है, हिम से खुद को बचाता है। आया है ये एक कठिन पहर, हिम टूट पड़ा भू मंडल पर। सड़कों पर बेबस रोते हैं, हर रोज़ ज़िंदगी खोते हैं। जो चूर महलों की रौनक में, ज़िंदगी से बेखबर होते हैं। इक धुंध में गुम है सारा शहर, हिम टूट पड़ा भू मंडल पर। वन जीवन सारा रुक सा गया, वृक्षों का कद झुक सा गया। पशुओं पर छाया आलस है,  निद्रा में जंगल डूब गया। सूखी डाली, सूखा शजर, हिम टूट पड़ा भू मंडल पर। जग जीवन अब थर्राता है, मन व्याकुल सा हो जाता है। है ठिठुर चुका सारा तन मन, कुछ गरमाहट ना पता है। मृत सा ठंडा पड़ा है शर, हिम टूट पड़ा भू मंडल पर। हिम का अब तेज हरूं कैसे? अग्नि जग में भरूं कैसे? किस तरह ज़िंदगी जाग उठे? तम को सूरज मैं करूं कैसे? जागे कैसे कोई आग प्रखर? हिम टूट प...