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सूरमा की पहचान

अंत निकट हो भले मनुज जीवन का,
भय विकट हो भले ढेर होते इस तन का।
लेकिन संबल ना छोड़ो अपने मन का,
दिखलाओ जग को बल अपने जतन का।

अंबर कब केवल बस तम का होता है?
या कि बस केवल चंदा का ही होता है?
जगमग होते हैं अगणित कई सितारे,
कुछ चमके सूर्य से, कई टूटकर हारे।

लेकिन नभ में हर हारा हुआ सितारा,
ध्रुव बनकर फिरता रहता है आवारा।
उसको देखे बिन जग ये कहां चलता है,
गर टूटे तो जग अपनी मुराद करता है।

कब थककर बैठा कभी सूरमा रण में?
बहता है लहू खौलता हुआ कण कण में।
डगमग होते हों भले ही पांव कभी भी,
धीरज खोता है नहीं वो वीर कभी भी।

राही गर कभी हो हार जाए राहों से,
कैसे वो गहेगा मंज़िल अपनी बाहों से।
थककर जो बैठ जाते हैं पंथी जग में,
मिलते हैं उन्हें बस कांटे ही पग पग में।

तुम राही अपनी मंज़िल पर ध्यान लगाओ,
थककर बैठो इससे अच्छा मर जाओ।
आओ जब भी तो ख़ुद उमंग ही लाओ,
जल, थल, अंबर को मंत्रमुग्ध कर जाओ।

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इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi

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