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मैं "दिनकर"

हूं निमिष मात्र मैं निमिष कथा है मेरी,
छोटा सा हूं मैं सूर्य, छोटी विभा है मेरी।
मैं ज्योतित करता हूं शब्दों का मेला,
जब भी काग़ज़ पर है दवात उड़ेला।
आता जो भी नैसर्गिक विचार लिखता हूं,
दिनकर हूं, दिनकर सा ही मैं दिखता हूं।

काग़ज़ पर लफ्ज़ों का अंबार लगाया,

हर बार कलम का मैंने ज़ोर दिखाया।
सत्ता, सियासत, प्रेम, करुणा की कहानी,
मैंने हर एक कथा थी ख़ुद से बखानी।
जीवन के हर एक रंग को रूप दिया है,
मैंने सूरज को प्रभा का दान दिया है।

निष्ठुर मन को भी है मैंने पिघलाया,

निर्मोही को है प्रेम करना सिखलाया।
बांधी मैंने डोरी राखी की हांथो में,
ना बांटा कभी स्नेह को दो पाटों में।
भाई का भाई से है मेल कराया,
बहनों के माथे पर शुभ तिलक सजाया।

मैं कवि सूर्य सम गतिमान चलता हूं,

शब्दों के काग़ज़ पर मैं बाण चलता हूं।
मेरा निसर्ग जब हुआ उदित गर्भ विभा के,
चमका मैं जग के उज्जवल कनकशिखा पे।
मुझको ना बांध सका कोई बंधन में,
बल ना कोई भी साध सका तन मन पे।

- रजत द्विवेदी






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