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नियति

है नहीं यह वही ठोर जिस पर मैं जलता था। अवनी की बनती अंगीठी जब मैं चलता था। पांव पर जब छालों का श्रृंगार होता था। राह पर नित कांटों का भंडार होता था। मौसमों में एक अपनी जलन होती थी। देह में पर ख़ुद-ब-ख़ुद एक गलन होती थी। छूटता था जो पसीना मुझे भिंगोता था। मेरे हांथों में बस बहता पानी होता था। अब मगर क्या हो गया इस ठोर पर आकर? पांव के नीचे हैं मिलते फूल भर भरकर। जैसे नियति मुझ पर कोई दया दिखाती है। मुझको मेरी दुर्बलता का बोध कराती है। मैं दया का पात्र तो कभी नहीं रह चुका हूं। हर एक पीड़ा को बहादुरी से मैं सह चुका हूं। तो क्यों नियति करुणा का मुझे विष पिलाती है? मुझको अपने सामने क्यों यूं झुकाती है? - रजत द्विवेदी h //www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/hai-nhiin-yh-vhii-tthor-jis-pr-main-jltaa-thaa-avnii-kii-jb-w1ec3

पाठक और लेखक

यह भी एक यथार्थ है कि इन रचनाओं का कुछ मोल नहीं। पाठक को जो छू जाए ऐसे अब कहने को बोल नहीं। आज पद्धति संवादों की ऐसी कुछ बन आई है। एक ज़रूरत मन को बस सुकून देने की हो आई है। कोई रचना मिलती है जब किसी पाठक की हालत से। वह जोड़ लिया करता है खुद को कुछ पल को उस रचना से। और हाय! जब दिल को उसके कुछ तसल्ली हो जाती है। सारी रुचि पाठक की फिर जाने कहां खो जाती है। अब मिलते हैं बहुत ही कम वो स्वार्थहीन सच्चे प्रेमी। जो लेखक की प्रतिभा का भी मोल समझा करते हैं। लेखक केवल प्रशंसाओं का भूखा कभी नहीं होता है। वह अपनी रचनाओं की सच्ची समीक्षाएं खोजा करता है। सच्ची प्रशंसा या निंदा- ये ही लेखक को सिखाती हैं। अच्छे को बेहतर, बेहतर को सर्वश्रेष्ठ बनाती हैं। इसलिए एक पाठक लेखक के जीवन में ज़रूरी है। पाठक बिन लेखक की रचनाएं अक्सर अधूरी हैं। -रजत द्विवेदी

शास्त्री

कितने कष्ट कंटकों में उलझा रहता ये एक प्रसून। जग की तंद्रालस्य छोड़कर, खिला कहीं विजन में दूर। जिसकी सरल, कमोलता से रवि भी पिघल जाता है। नयन नीर को धरती पर जो सावन सा बरसाता है। ऐसा ही एक मनुज हुआ था भारत की इस धरती पर। जिसके सहज, सरल जीवन पर प्रमुदित रहा करते थे सब। छोटा कद और शिथिल शरीर, मगर अनंत प्रतिभाशाली। जिसने अपनी सरल मुस्कान से सारी दुनिया जीत डाली। ऐसा प्यारा नेता जग में और कहीं फिर होगा क्या? ऐसा वीर प्रणेता कोई और कहीं फिर होगा क्या? " लाल बहादुर" नाम नहीं ऐसे ही इन्होंने पाया है। कुटिल सियासी खेलों में अपना आदर्श दिखाया है। भूल रहा क्यों देश आज ऐसे सहजगुण नेता को? भूल रहा क्यों देश आज इस सरल विश्व विजेता को? - रजत द्विवेदी

कलम और कागज़

इतिहासों में लिखा जायेगा कभी यह भी अपराध। बिगड़ रहा है आज कलम और कागज़ का संवाद। एक दौर था जग का जब सामर्थ्य लिखाया जाता था। और प्रेम गीतों पर सहज ही मोती लुटाया जाता था। लेखन थी आराधना एक, वो मां भारती की वंदना थी। जननी जन्मभूमि थी और हिंदी उसकी अर्चना थी। रजत निशा में दीप जलाए रखते थे कलम पर आलोक, और बुझा जो दीप कभी तो लिख देते थे हम भी शोक। उदय प्रांत का एक दिवाकर और मैं दिनकर कलमकार। दोनों नित नित पुण्य विभा से जग को करते थे साकार। किन्तु आज क्या हाल हो गया लेखन की परिभाषा का। भेद नहीं पता चलता, क्या करते लोग हैं भाषा का। शब्द शब्द अशुद्ध हो गए, भाव कहां से व्यक्त करें। मोक्ष कहूं तो जग को लगता,"मरने को कहता है, अरे"! कहीं और विधाओं जैसे लेखन भी ना खो जाए। जो दुर्दशा हुई संस्कृत की, हिंदी की ना हो जाए। - रजत द्विवेदी

नर

खड़ा है आज नर क्यों खिन्न होकर? समूचे लोक से यूं भिन्न होकर। कहीं कुछ बात बदली है यहां क्या? मनुज की जात बदली है यहां क्या? क्यों जग से दूर होता जा रहा है? नहीं क्यों स्नेह सबका पा रहा है? था उसका दोष बस इतना ही कहना, नहीं कभी मौन हो अन्याय सहना। था बल उसमें कि सच को सच कहे वो। नहीं कभी झूठ की आश्रय गहे वो। मगर क्या खूब हुआ उपहास उसका। है दुष्कर अब तो लेना श्वास उसका। भला जो जग को यूं ललकारता हो। कलि से लड़ने को उच्चारता हो। कहां वो चैन से अब जी सकेगा? कहां जीवन का अमृत पी सकेगा? उसे तो अब हलाहल पीना होगा। स्वयं विषधर सा बनकर जीना होगा। है तपना अब उसे तो राम बनकर, मनुजता का अटल अभिमान बनकर। नहीं कोई और पथ बाकी है उसका। यहां पर कौन अब साथी है उसका? है जीना अब उसे तो पार्थ बनकर या मरना कर्ण सा निस्वार्थ बनकर। - रजत द्विवेदी

महिमामंडन

है कौन यहां जो रुकता है? जो पथ के आगे झुकता है। चलते रहते हैं उद्योगी, अपनी मंज़िल को मनमौजी। कब सोचा उन्होंने थकने का, या कि पराजय चखने का? बस जीतने की आस ठानी है। करनी ख़ुद की मनमानी है। पत्थर से मूक नहीं है हम, खाली संदूक नहीं हैं हम। हम में संचित हैं ध्वनि अपार, हम रत्नों का अनुपम भंडार। सागर मंथन में जन्में हैं, धन्वंतरी और अमृत भी हैं। अपनी कीर्तियां अपरंपार, हम हैं आशाओं का आधार। - रजत द्विवेदी

आरोहण

आज अग्नि सरिता में भिंगोए पांव लिए चलते हैं, हम अपने संग क्रांति का सौभाग्य लिए चलते हैं। पद ये पड़ेंगे जिस भी डगर पर, ज्योतित पथ को करेंगे,  बाद हमारे जग को ये एक अजर इतिहास कहेंगे। आज हमारा, औरों का कल होगा स्वर्णिम वह सपना, जिस पर अब तक सर्वस्व लुटाया है हम सबने अपना। और दीप्त हो रहा है नभ देखो तन की ज्वाला से, छलक रहा है अमृत जैसे इंकलाब हाला से। चमक रहीं श्यामल ललाट पर श्रमवारि की बूंदें, कैसे इस दुर्लभ मुख पर कोई रह सकता आंखें मूंदे? फूट पड़ी हैं दिव्य शिराएं रक्तधार कंपन से, ठंडक देती है ज्वाला जैसे शीतल चंदन से। करुण विभाएं आज तरुण इस देह को सहलाती हैं, पुण्य समीरा हल्के हल्के कानों में कहती जाती है- "ओ कुमार, ये ही है आरम्भ तेरी अनंत कीर्ति का... तुझको ही हरना है अब सारा विषाद धरती का।" पुण्य दिवाकर जैसे अब हमको तो नित जलना है, या कि हिमकर के समान रजनी को अमर करना है। कौन कह रहा कर्ता कोई जग का शेष नहीं है, यह आरोहण है जग का, कोई ध्वंस अवशेष नहीं है।  -रजत द्विवेदी