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आलोक...

अरुण आलोक की जयकार बोलो।
जगत की ज्योतियों के द्वार खोलो।
जगा है नींद से ये भोर जब से,
सुनाई दे रहा है शोर तब से।
कोलाहल है ये एक नई ज़िंदगी का।
पशु पक्षी, विपिन का और पवन का।

वही आलोक है, वो ही गगन है।
वो ही स्वच्छंद सा उन्मुक्त मन है।
वो ही उन्माद मन में अा रहा।
वो ही एक भाव हिय पिघला रहा है।
जो एक उम्मीद जग को बांधती है।
निशा के अंत को शुभ मानती है।

कि देखो फूल सब मुस्का रहे हैं।
भंवर को प्रेम से पुचकारते हैं।
गगन पंखों को उड़ते देखता है।
रवि की ज्योति से दृग सेंकता है।
धरा खिल जाती है रश्मि को पाकर।
नया जीवन मिला ज्यों जाग कर।

- रजत द्विवेदी


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इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi

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