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"Chadha de rang mujhe par basanti
aajkal baaki sab rang mujhe paani lagte hai"
"Jab se aashiq hue hain hum bharat ke
laila-majnoo,heer-ranjheye sab kahani lagte hai"

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इस सुबह उस उफक़ पर.......

इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा, हर किसी की ज़िंदगी में इश्क़ बरसाया होगा। है इधर ये छांव जो क्या तुमको भी है मिल रही, या कि बस मेरे ही घर को धूप आज आई नहीं। क्या कभी तुमको भी इश्क़ ने इतना तरसाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर जब अफताब इश्क़ का आया होगा। क्या कभी तुमको मिली वो ठंडी सबा इस सहर की, जिसको अरसे से भेजा करता था मैं तेरे नाम पर। मुझको अब तक ना मिला पैग़ाम तेरे मिलने का, क्या कभी इस क़दर किसी का दीदार तुझे तड़पाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। आज भी चाहत मुझे है बस तेरे इक नाम से, आज भी खोता सुकूं हूं बस तेरे ही नाम पर। मुझको मिलता ही नहीं है एक भी पल चैन का, क्या कभी किसी के खयाल ने तुझको भी नींद से जगाया होगा? इस सुबह उस उफक़ पर अफताब इश्क़ का आया होगा। - रजत द्विवेदी https://www.yourquote.in/rajat-dwivedi-hmpx/quotes/subh-us-uphk-pr-jb-aphtaab-ishk-kaa-aayaa-hogaa-hr-kisii-kii-o3hoi

वीर सुभाष तेरी जय हो ।

वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो। वीर  सुभाष  तेरी जय हो । उपकारी तेरी करनी  की कीरत यहाँ अजय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।  फूँक दिया था जो  तूने  वह बिगुल क्रांति का जग में।   बसा लिया जो तूने  रंग तिरंगा रग  रग में।  निकल पड़ा  था तू जग में  करने भारत का  उद्धार आज़ाद  कराने  भारत को  करने मातृभूमि पर उपकार  तेरी उस कोशिश की जय हो ।  वीर  सुभाष  तेरी जय हो ।    अपनी  पहचान छुपाकर के  तूने भारत का नाम  किया ।  अपना जीवन त्याग कर  तूने भारत भविष्य रचा ।  अधीर हो उठी जनता आज़ादी का यह रस्ता जचा । कर डाला तूने वो कमाल जिसपर जग को विस्मय हो । वीर  सुभाष  तेरी जय हो । -रजत द्विवेदी 

आसमान से ऊँचा......

आसमान से ऊँचा क्या है?कौन समुद्र से गहरा?  कौन भूमि से भारी जग में?कौन जल से पतला?  कौन सूर्य से भी ज्यादा चमक रहा इस जग में?  कौन डूब कर गिर जाता है घने काले गर्त में?  कौन यहाँ पर अमर हो जाते?कौन यहाँ नश्वर है?  कौन यहाँ पर सदा हारते?कौन यहाँ अजर है?  आसमान से ऊँचा जग में स्वाभिमान है नर का और समुद्र से गहरा जग में विशाल सागर प्रेम का| भूमि से भी भारी जग में पाप,कपट और छल है| जल से भी पतला इस जग में ज्ञान का गंगाजल है| सूर्य से भी ज्यादा चमकता मनुष्य का कर्म है| और डूबा देता जो गर्त में धर्म नहीं अधर्म है| सच्चा शूरवीर जगत में सदा सदा अमर है| मूढ़मती पथहीन मनुज तो निश्चय ही नश्वर है| यहाँ हारते सदा वही जो संबंधों से डरते हैं | जो समाज से संबंध बना सके, वो ही मनुज अजर है| -रजत द्विवेदी